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वाराणसी का मणिकर्णिका घाट, जिसे मोक्ष का द्वार भी कहा जाता है. यहां 24 घंटे चिताएं जलती हैं. मौत कभी सोती नहीं. धुआं आसमान से बातें करता है और जीवन और मृत्यु के बीच की रेखा मिटती हुई सी नज़र आती है. मणिकर्णिका घाट को दुनिया के सबसे प्राचीन और रहस्यमयी घाटों में से एक माना जाता है. ऐसा कहा जाता है कि जो यहां जो भी अंतिम सांस लेता है उसे मोक्ष मिलता है. ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव स्वयं यहां कान में तारक मंत्र देते हैं. हालांकि ये अभी भी रहस्य है कि अंतिम संस्कार कराने वाला पंडा मृत शरीर के कान में क्या बोलता है. देश विदेश से लोग यहां अपनी अंतिम यात्रा के लिए आते हैं.

सुबह-दिन-रात आप जिस वक्त भी इस घाट पर जाएं आपको चिताएं जलती ही नज़र आएंगी. पौराणिक मान्यता के अनुसार देवी पार्वती के श्राप के कारण ऐसा हुआ. दरअसल, एक कथा के अनुसार देवी पार्वती के कानों का कुंडल इस घाट पर गिर गया था. उन्होंने उसे काफी देर तक वहां ढूंढा. लेकिन जब वो नहीं मिला तो देवी नाराज़ हो गई और श्राप दे डाला कि ये घाट हमेशा जलता रहेगा. लोगों का मानना है कि इसी श्राप के कारण यहां 26 घंटे 365 दिन चिताएं जलती रहती हैं.

मणिकर्णिका घाट से जुड़ी कई रहस्यमयी परंपराएं हैं जो इंसान की उत्सुकता बढ़ाती है. एक परंपरा के अनुसार मृत व्यक्ति के कान सवाल पूछा जाता है. पंडों का मानना है कि ये सवाल आत्मा की अधूरी इच्छाओं और पछतावों से मुक्त करने के माध्यम है. कहा ये भी जाता है कि जिन भी व्यक्तियों का अंतिम संस्कार यहां किया जाता है उसके कान में पूछा जाता है कि क्या उसने देवी की बाली देखी है?

राख पर लिखा जाता है 94 नंबर
जब मणिकर्णका घाट पर किसी का अंतिम संस्कार किया जाता है तो राख ठंडी होने पर उसके ऊपर 94 नंबर लिख दिया जाता है. ऐसा कहा जाता है कि किसी भी इंसान में 100 गुण होते हैं और इसमें से 6 गुण भगवान ब्रह्मा के हाथ में होते हैं. बाकि गुण इंसान के अच्छे और बुरे कर्मों पर निर्भर करते हैं. इंसानों को अपने कर्मों से मुक्ति मिले इसलिए ये नंबर लिखा जाता है।
