डा0 एन.के मौर्य (चीफ एडीटर)
बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास में भारतीय सेना की टुकड़ी का नेतृत्व करने वाली पहली महिला अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी ने बुधवार को जब मीडिया के समक्ष ऑपरेशन सिंदूर के बारे में जानकारी दी, तो उनकी जुड़वां बहन शायना सुनसारा की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए। कर्नल कुरैशी ने आखिरी बार जनवरी में वडोदरा में रहने वाले अपने माता-पिता से मुलाकात की थी और एमएस यूनिवर्सिटी के फैकल्टी ऑफ साइंस के कैमेस्ट्री डिपार्टमेंट में अपने टीचर्स से मुलाकात करके उनसे भी बातचीत की थी।

बताते चलें कि इंडियन एक्सप्रेस पर फोन से बातचीत में शायना ने कहा, ‘हमने कल बात की थी और एक आर्मी अफसर होने के नाते उन्होंने आज सुबह होने वाली घटना के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा। हम सभी के लिए यह हैरानी की बात थी, लेकिन सोफिया को इस पद पर देखना गर्व की बात थी। उनमें हमेशा देश के लिए कुछ करने का जुनून था। हालांकि वह (डीआरडीओ) में शामिल होना चाहती थीं, साइंटिस्ट बनना चाहती थीं और डॉ0 एपीजे अब्दुल कलाम के साथ काम करना चाहती थीं।

शायना ने इंडियन एक्सप्रेस को आगे बताया, ‘उन्हें अमेरिका से भी कई प्रस्ताव मिले थे, लेकिन वह भारत में ही रहकर सेना में शामिल होना चाहती थीं। वह अपने पहले प्रयास में ही सेना में शामिल हो गईं। शुरू में मेरा सपना सेना में शामिल होना था, लेकिन एनसीसी में होने और सभी कोशिशों के बावजूद, मेरा चयन नहीं हुआ। मुझे अभी भी इसका अफसोस है, लेकिन जब मैं उन्हें वर्दी में देखती हूं, तो ऐसा लगता है कि मैं उनके जरिये अपना सपना जी रही हूं।
पिता और दादा दोनों ही सेना मे दे दिखे हैं सेवा : शायना
शायना ने कहा कि उनके पिता और दादा दोनों ही सेना में सेवा दे चुके हैं। उन्होंने कहा, ‘हम साथ-साथ बड़े हुए, शुरू में अपनी दादी से रानी लक्ष्मीबाई की वीरता की कहानियां सुनते रहे। जब हम अपने पिता के रिटायरमेंट के बाद वडोदरा में रहने लग गए, तो सेना का डिसीप्लीन और देशभक्ति हमारे पारिवारिक मूल्यों की नींव पर बनी रही। अगर हमारे माता-पिता को विकल्प दिया जाता, तो सभी पांच भाई-बहन एक बड़ा भाई और दो छोटे भाई सेना में चले जाते। सोफिया अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित रही है और उसके जैसा कोई नहीं है। जब भी हम मिलते हैं, वह लगातार इस बारे में बात करती है कि वह महिला अधिकारियों के लिए सेना में क्या कर सकती है या कुछ नया या अलग विचार ला सकती है। वह एक मेहनती इंसान है। शायना ने याद करते हुए बताया कि जब कर्नल सोफिया को 2006 में संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन के तहत कांगो भेजा गया था, तो उन्होंने युद्ध क्षेत्र से अपनी बहन को फोन किया था। उन्होंने कहा, ‘वह जानती है कि मैं उसके जरिये एक आर्मी अफसर बनने का सपना जी रही हूं। इसलिए, जब वह कांगो पहुंची, तो उसने मुझे फोन किया और मुझे फायरिंग और बमबारी की आवाजें सुनाईं और पूछा, शायना क्या तुम ये आवाजें सुन रही हो ? ये फायरिंग की आवाजें हैं।’

कर्नल सोफिया कुरैशी अक्स वडोदरा आती हैं: शायना
शायना ने कहा कि वह परिवार से मिलने के लिए अक्सर वडोदरा आती रहती हैं। लेकिन जब से उन्हें हाल ही में रैंक में प्रमोट किया गया है और उन्हें ज्यादा जिम्मेदारी दी गई है, तब से वह पहले जितनी बार नहीं आती हैं। वह इस बात को लेकर भी बहुत सजग रहती हैं कि हम उनके बारे में सोशल मीडिया पर क्या शेयर करते हैं। वह मुझे कॉल करती हैं और तुरंत मुझसे कोई भी पोस्ट या फोटो हटाने के लिए कहती हैं जिससे उनकी लोकेशन का पता चल सकता है।
पहलगाम हमले को लेकर क्या बोलीं शायना
पहलगाम हमलों और ऑपरेशन सिंदूर के बारे में बोलते हुए शायना ने कहा, ‘आतंकवाद को धर्म का रंग नहीं दिया जाना चाहिए। आतंकवाद को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता क्योंकि यह मानवता और अर्थव्यवस्था को खत्म कर देता है। ऐसे कृत्यों के कारण लोगों का दिमाग भ्रष्ट हो जाता है। मुझे देश पर गर्व है और आतंकी कृत्य का जवाब देने का फैसला उचित था।
